/, Uncategorized/A unsuccessful life story of vrinda

A unsuccessful life story of vrinda

By |2020-02-14T10:12:56+00:00February 14th, 2020|Inspiring Story, Uncategorized|

सफल व्यक्तित्व के बारे में तो बहुत लिखा गया है परंतु ऐसा व्यक्तित्व जो असफल
होते हुए भी अपने आप में सफल है।
ऐसी ही एक लड़की की सच्ची कहानी को मैं यहां लेकर आयी हूं ।नाम वृंदा।
वृंदा का जन्म दिल्ली में हुआ । वृंदा अपने दादा दादी, मां और पिताजी के साथ
रहती थी। चाचा और ताऊ पहले से ही अलग हो गए थे । वृंदा जब आठवीं कक्षा में
थी, तभी उनके पिताजी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई । पिताजी से बहुत प्यार
था, वहीं उसके लिए प्रेरणा के पात्र थे, पढ़ाई में बहुत योगदान उनका रहा।
वृंदा हर परीक्षा में अव्वल आती थी। पिताजी के जाने के बादउसकी जिम्मेदारियां

बड़ गई । वृंदा के पिताजी के जाने के बाद उसके संघर्ष की कहानी शुरू होती है।
वृंदा को अपनी छोटी साढ़े चार साल की बहन को संभालने के कारण वह ठीक से
पढ़ाई पुरी नहीं कर पाई । पढ़ाई में पिछड़ गई। फिर भी बी. ए. कर लिया।
वृंदा के ख्वाब पिताजी के जाने के बाद जैसे खत्म से हो गए।
वह लिखने में निपुर्ण थी। कविताएं लिखती थी, लेकिन धीरे धीरे जिम्मेदारियों ने
उसके सारे ख्वाबों को तबाह कर दिया । नृत्य और गायन में निपुर्ण थी । परन्तु धन
के अभाव के कारण कभी अपने सपनों को साकार नहीं कर पाई । जो उसकी एक
प्यारी कविता में हमें झलकता हुआ दिखाई देता है :
कुछ ख्वाब अधूरे है मेरे
और कुछ ख्वाहिशें
तमन्ना थी आसमान में उड़ने की

तमन्ना थी धरती पर थिरकने की
और सब कुछ बिखर गया

ये वृंदा की लिखी कविता की कुछ पंक्तियां है ।
वृंदा बड़ी हुई तो उसकी शादी कर दी गई ।अनजान घर,
अनजान लोग । एक बार मिलकर ,पहले रिश्ते तय किए जाते थे ।
यही सोचकर दादा ने रिश्ता तय कर दिया ।न ज़्यादा पूछताछ की।
आज की युवापीढ़ी सब सोच समझ कर तय करती है।

परंतु पहले तो बड़े लोगों ने जो तय किया। उसी को सही
मानकर वृंदा ने भी हां कर दी। लड़का बहुत अच्छा था, परन्तु
घर के माहौल के बारे में वृंदा के मायके वालों को कुछ नहीं
पता था। शादी से तेरह दिन पहले ही वृंदा के दादा चल बसे।
दुनिया की चालाकियों से वृंदा परे थी। बहुत ही सीधी थी वो।
ससुराल में साब अच्छा था पर एक गलत इंसान की ईर्ष्या की
आग पूरे घर को जला कर राख कर देती है। उसके संघर्ष का
सफर यहां दोबारा शुरू हो गया।पहला पिताजी के जाने के बाद
और दूसरा ससुराल में कदम रखने के बाद । कुछ दिन सब ठीक
रहा पर बाद में वृंदा की भाभी ने वृंदा को मानसिक रूप से
परेशान करना शुरू कर दिया। छोटी बहू होने के कारण उसे
बोलने की मनाही थी। इसलिए चुप रहने की सलाह दी गई। वह
कुछ बोलती तो उसे मार कर चुप करवा दिया जाता। हर काम
में निपुर्ण वृंदा की क्या यही नियति थी।क्या उसका कोई अपना
वजूद या आत्म सम्मान नहीं है।क्या उसके लिए कोई आवाज
नहीं उठाएगा। भाभी द्वारा मानसिक प्रताड़ना बढ़ती ही गई।
क्या हमारे समाज में मानसिक प्रताड़ना देने वालों के खिलाफ
कोई कानून नही? क्या दुनिया में जूठ का ही बोलबाला है ,वृंदा
की सच्चाई का कोई महत्व नहीं, क्या वृंदा को भी जूठ और
कपट का सहारा ले लेना चाहिए? वृंदा की मासूम आंखो के
आंसू उसके भीतर के दर्द को बयां कर रहे थे। उसकी एक कही
गई बात ने मुझे अंदर तक व्यथित कर दिया। ” दीदी मेरे
ऊपरी घाव तो भर जाएंगे पर मेरे भीतर के घाव कैसे भरेंगे ”

मेरी आंखो से भी उस वक्त आंसू आ गए।माना कि वृंदा की
कहानी आज की महिलाओं की स्थिति को बयान करती है,और
बहुत ही सहज कहानी है पर क्या यह स्थिति आगे भी ठीक हो
पाएगी? सुधार तो आया है पर इतना नहीं । कुछ बातें ऐसी थी
जो मैं यहां बयां नहीं कर सकती थी पर उसे ऐसा कभी कभी
कहा जाता था जो सुनकर अच्छा नहीं लगता था। मायके वाले
कहते है ये अब तेरा घर नहीं । ससुराल ही तेरा घर है, ससुराल
वाले कहते हैं कि ये घर तेरे बाप का नहीं।तो वास्तव में एक
लड़की का घर कौनसा है? वृंदा से यह भी कहा गया कि ” बहू
कभी बेटी नहीं बन सकती।” मैं पूछती हूं क्यों? मेरा सवाल उन
सब सास से है कि कभी आपने मां बन कर बहु को गले लगा
कर देखा है । बहु अपने आप बेटी बन जाएगी।कोशिश तो
करिए उसे बस थोड़ा प्यार चहिए।वो अपना घर ,अपना
मायका ,अपनी बचपन की यादें अपने मां बाप सब कुछ
छोड़कर ,एक अनजान घर अनजान लोगों के बीच अपने कदम
रखती है ,सब को अपनाती है ,अपने सारे फर्ज निभाती है।क्या
बेटे ये कर पायेंगे? मेरे अनुसार आगे की पीढ़ी में ऐसा कानून
बने कि बेटी को ससुराल न भेजकर , बेटों की विदाई की
जाए ,उन्हें भी उस दर्द का एहसास हो जो बेटियां हंसकर कबूल
करती हैं।

वृंदा का एक साल ऐसे ही निकला।रोज डरी सहमी रहती।एक
साल बाद उसने एक बेटे को जन्म दिया। इक्कीस साल की
वृंदा ,जिसे मां बनने की समझ नहीं थी,दादी और मां की मदद
से उसने बेटे को जन्म दिया और संभाला।कुछ साल बाद दादी
भी चल बसी।दादी के स्वर्गवास के बाद वृंदा ने एक लड़की को
जन्म दिया।अपने दोनों बच्चों को देख कर वृंदा अपने सारे गम
भूल जाती।भाभी की प्रताड़ना बढ़ती गई ।रोज घर में झगड़े
बढ़ते गए।अपने बच्चों की सही परवरिश और खराब माहौल से
बचाने के लिए वृंदा ने घर से निकलने का फैसला किया। उसने
और उसके पति ने घर छोड़ दिया और अलग रहने लगे।उनके
पास कुछ नहीं था ।अपनी मेहनत और लगन से घर को अच्छा
बना लिया।कुछ साल बाद इतनी कम कमाई में घर चलाना
थोड़ा मुश्किल लगने लगा।इसलिए वृंदा के पति ने बाहर निकल
कर कमाने का फ़ैसला किया। उन दोनों के घर से निकलते ही
पीछे से घर का सामान चोरी हो गया।उनको वापस आना पड़ा।
उनके पीछे से बहुत कुछ ग़लत हो गया। उनके माता पिता की
देखभाल करने वाला कोई न था। उनके बड़े भाई ने पूरी दुकान
बर्बाद कर दी थी। इसलिए अपने माता पिता की चिंता के कारण
अपनी नौकरी छोड़कर वापिस आ गए। स्थिति सुधरने का नाम
नहीं ले रही थी।वृंदा के पति के भाई जायदाद को लेकर अपने
पिताजी से लड़ने लगे। इसलिए वृंदा के पति ने अपने हाथ में
सब जिम्मेदारी ले ली।

इन सब झगड़ों के कारण न तो वृंदा कभी अपनी जिंदगी में
आगे बढ़ पाई ,न कुछ कर पाई। वो पढ़ना चाहती थी परन्तु
झगड़े के कारण उसने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।उसकी बेटी
उसे बहुत प्रोत्साहित करती ।फिर से कविता लिखने की
शुरुआत भी करवाई।उसने फिर से कविता लिखना शुरू कर
दिया। पढ़ना भी शुरू कर दिया।आज वृंदा के पास अपनी
काबिलियत के अलावा कुछ नहीं था। वृंदा की मां भी उसके
पास आ गई ।वृंदा और वृंदा के पति अब थोड़े में ही तीन वृद्ध
लोगों को संभाल रहे है। वृंदा को भगवान के रूप में एक लड़का
मिल गया – किशन |जो बहुत ही मदद करता । वह बेटे से भी
बढ़कर था ।वृंदा की आंखों में आज भी आंसू थे। बेटा और बेटी
वृंदा का हौसला बहुत बढ़ाते। उसका मानसिक संतुलन ठीक न
था परन्तु उसने फिर से लिखना शुरू कर दिया। गाना भूल चुकी
थी उसे फिर से शुरू करने के लिए बेटी ने प्रोत्साहित किया।
उसका संघर्ष लाजवाब था।उसकी कुछ बातें अनकही थी परन्तु
उसकी आंखें उसके दर्द को बयान कर रही थी। पिता के जाने
के बाद इस दुनिया के गलत लोगों से जूझना ,ससुराल में
प्रताड़ित होने के बाद दोबारा खड़े होना और हार न मानना। मैं
यही कहना चाहती हूं कि जो लड़की हर कार्य में निपुर्ण है ,वो
बहुत आगे बढ़ सकती है,उसे आगे बढ़ने का मौका ही न दिया
गया।उसकी ख्वाहिशों को खतम कर दिया गया।काश ऐसा न
हुआ होता तो आज वृंदा आसमान की उन ऊंचाइयों को छू
सकती थी जिसे वो छूना चाहती थी । प्रत्येक नारी में कोई न
कोई गुण होता है,पर उसे बाहर उसे ही निकालना पड़ेगा,और
समाज को भी उसे आगे बढ़ाना होगा।

आज की नारी केवल रसोईघर तक ही सीमित नहीं है ,उसके
आगे भी उसकी एक दुनिया है, खुद को संवारने की,खुद को
आगे बढ़ाने की,खुद के अपने वजूद की,खुद के आत्म सम्मान
को जिंदा रखने की । वह हार मानने वालों में से नहीं है।इसलिए
हमें भी समाज के गलत रीति रिवाजों से ऊपर उठकर वृंदा जैसी
बहुओं को एक नई दिशा की ओर अग्रसर करना होगा।वह भी
आगे
बढ़े
सकती है ।शादी के बाद जिन्दगी ख़त्म नहीं हो
जाती,उसके आगे भी बहुत बड़ी जिन्दगी है कुछ करने के लिए।
वृंदा यही करना चाहती है ,उसके लिए उम्र मायने नहीं रखती।
वह आगे एम.ए की तैयारी करना चाहती है, और उसके आगे
भी पढ़ना चाहती है।वह उन सब नारियों को जो विवाह के बाद
कुछ ना कर पाई उनके लिए प्रेरणा बनना चाहती है,जो उसकी
एक कविता में बयां है – प्रत्येक नारी को समर्पित –
खुद से खुद की तलाश हूं मैं,
अपने वजूद को कहीं खो दिया है मैंने,
खुद से खुद की पहचान हूं मैं,
दूसरों से उम्मीद का दामन छोड़ दिया है मैंने ,
खुद से खुद में जीने की राह हूँ मैं,
ठोकरों ने झकझोर दिया है मुझे

अथाह सागर का परिवार हूं मैं

खुद से खुद की तलाश हूं मैं
मंजिलों ने दामन छोड़ दिया है
अपनों ने पराया कर दिया है,
फिर भी खुद से खुद की पहचान हूं मैं।

वाकई में वृंदा को किसी पहचान की जरूरत नहीं।उसे समाज
के सहारे की जरूरत है। इस कहानी के जरिए मैं वृंदा को सफल
नारी बनाना चाहती हूं।शायद वो इस कहानी के ज़रिए सफल हो
जाए और उसे उसकी पहचान मिल जाए, ताकि वो अपने आगे
के सपनों को पूरा कर सके। मैं शायद इस कहानी के जरिए
उसकी आर्थिक रूप से भी मदद कर सकुं, जिससे वो अपने
सपनों की उचाइयों को छू सके और ये कहानी आज की नारी के
लिए प्रेरणा साबित हो सके ।हो सके तो कृपया वृंदा की मदद
कीजिए।

लेखिका
फेरिका शाह
कानपुर (यू. पी)

 

0

About the Author:

Leave A Comment

14 + 8 =